धर्म अर्थ काम व मोक्ष क्या है इनसे कैसे बचे What Is Dharm Arth Kaam Moksha In Hindi
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What Is Dharm Arth Kaam Moksha In Hindi
सभी बचपन से सुनते-पढ़ते आये हैं कि मानव-जन्म धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष अर्जित करने के लिये मिला है जिन्हें एकसाथ पुरुषार्थ-चतुष्ट्य भी कहते हैं। इन चारों शब्दों में निहित अर्थ समझने में लोग प्रायः भूल कर बैठते हैं, इसलिये आज इसी विषय में विस्तृत विश्लेषण करते हुए इन पुरुषार्थों को समझते हैं तथा ध्यान रहे कि ये पुरुषार्थ स्त्री व पुरुष इत्यादि सबके लिये हैं, न कि पुरुष मात्र के लिये।
मोक्ष के लिये आयु, अवस्था अथवा व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का कोई महत्त्व, कोई पूर्वाग्रह नहीं होता, स्त्री, चाण्डाल से लेकर महा क्षूद्र भी धर्म व भक्ति के बल पर सहजता से मोक्ष का अधिकारी बन सकता है।
अर्थ व काम धर्मोचित होने पर ही मोक्ष की ओर ले जा सकते हैं। धर्म का आसरा पाकर अर्थ व काम को न्यूनतम रखकर अथवा श्रेष्ठ होगा कि इन दोनों को छोड़कर सीधे मोक्ष की ओर बढ़ा जा सकता है ताकि अल्पतम व्यवधानों में मोक्ष तक पहुँचा जा सके.
What Is Dharm Arth Kaam Moksha In Hindi
धर्म.. धर्म क्या है ? (What Is Dharma)
‘क्या करें या क्या न करें’ को समझकर ‘क्या करें’ उसी ओर अपनी सम्पूर्ण जीवन-ऊर्जा लगा देना ही धर्म का मूल है। धर्म को हिन्दू, मुस्लिम इत्यादि सम्प्रदायों से न जोड़ें। जो विचार धारण करने योग्य, जो कर्म करने योग्य होता है वही धर्म है जो कि देश-काल-वातावरण से परे सबके लिये समान होता है।
सत्य, अहिंसा, न्याय, पेड़-पौधों व पशु-पक्षियों सहित समस्त देहधारियों की सेवा ये धर्म के चयनित उदाहरण हैं। अपनी आत्मा को परमात्मा से मिलन के लिये पवित्र बनाने की ओर अनिवार्य तत्त्व धर्म है।
व्यक्ति हर विचार, हर कर्म प्रभु के लिये करे, कोई भी ऐसा कार्य अथवा विचार न करे जो उसे ईश्वर तक सीधे न ले जाता हो। अपना एक मंत्र बनायें जिसे आप आजीवन चैबीसों घण्टे बारह माह हर कार्य में उच्चारित करते रहें, जैसे कि यदि आप यदि श्रीराम को अपना इष्ट मानते हों ईश्वर की भक्ति में हर प्रकार से, समस्त रूपों में ऐसे डूब जायें कि ईश्वर स्वयं आपसे मिलने को मचलने लगें।
अर्थ क्या है (What Is Arth )
अर्थ का तात्पर्य यहाँ धन तक सीमित नहीं है, अर्थ का अभिप्राय यहाँ प्रभु प्राप्ति (मोक्ष) तक शरीर के निर्वाहमात्र से है। अन्यथा अर्थ को तो कई ग्रंथों में, अनेक शास्त्रों में ‘अनर्थ का मूल’ कहा गया है। अर्थ का उद्देष्य मोक्ष के प्रयासों के दौरान खान-पान इत्यादि केवल मौलिक आवश्यकताओं की नीति संगत पूर्ति मात्र है। ‘आवश्यकता’ व ‘इच्छा’ में बड़ा अन्तर होता है।
साईं इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाय,
मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाये।
आत्मा जब तक शरीर में है मुक्ति के प्रयत्नों, साधनों के दौरान व सर्वविषयों से मुक्त होने के अभ्यास के दौरान शरीर को जीवित रखने के लिये जितने संसाधन जुटाने आवश्यक हों, अवश्य जुटायें परन्तु विविध संगत तरीके से, धर्मोचित रीति से तथा उन्हें व्यय भी धर्मसंगत रीति में करें, अन्यथा कहा भी गया है कि धन का आना भी दुःखदायी होता है व जाना भी दुःखदायी। धनलिप्सा व्यक्ति को बन्धन में डाले रहती है। धनोपर्जन में कभी अनुचित तरीके का आसरा न लें।
हो सके तो अर्थोपार्जन ऐसी जीविका से हो जो किसी न किसी प्रकार सार्थक, सकारात्मक हो अथवा प्रभु से जोड़े, जैसे कि पौधों की नर्सरी खोलना, बाँस के कारीगरों से विभिन्न डिज़ायनर घौंसले बनवाकर उन्हें गिलहरियों व पक्षियों के वास्तविक निवास के लिये लोगों को बेचना इत्यादि।
अर्थ में जीवन का न्यूनतम समय व ध्यान जाये यह स्मरण रखें, ईश्वर में ही अधिकतम ऊर्जा खर्च करनी है। बौद्ध भिक्षु इत्यादि तो अर्थ को बाधा बनने नहीं देते थे, वे गृहस्थों का बचा भोजन भिक्षा में माँगकर जीवन-निर्वाह कर लेते थे।
अपनी आवश्यकताओं में कटौती करें, जितना अति आवश्यक हो उतने में गुज़ारा करने की आदत बनायें। और ! और !! और !!! की पिपासा व्यक्ति को मोक्ष से दूर कर देती है, ऐसे व्यक्तियों के लिये अर्थ कोई पुरुषार्थ नहीं बल्कि भयानक अनर्थों का द्वार है. विलासिता, अतृप्त इच्छाओं, सामाजिक मान-प्रतिष्ठा इत्यादि के लिये अपव्यय (फ़िज़ूलखर्ची) के लिये धन बटोरने से बेहतर है कि सीमित व मूलभूत में संतुष्ट रहा जाये।
सत्ता, प्रतिष्ठा व धन का कौन-सा प्यासा कभी कहीं जाकर संतुष्ट हो सका है ? सुख से सोवै कुम्हार जाकी लूट न लेवे मिटिया अर्थात् कुम्हार सुख से सोता है क्योंकि वह संग्रह नहीं करता, वह अपरिग्रह करता है, उसके पास मिट्टी है, उसके पास ऐसा कुछ है ही नहीं जिसके छिन जाने, हाथ से फिसल जाने का भय उसे सताये, इसके स्थान पर नेता, व्यापारी इत्यादि सब के सब धन व प्रतिष्ठा के पीछे न दिन में चैन से रह पाते हैं, न रात में सुख से सो पाते हैं।
वाल्मीकि पहले लुटेरे थे, एक बार देवर्षि नारद के कहने पर उन्होंने अपने परिजनों से पूछा कि मैं तो तुम लोगों ही के लिये लूटपाट करता हूँ किन्तु क्या तुम मेरे इन पापकर्मों के फल में भागीदार बनोगे ? सबने मना कर दिया।
इस प्रकार वाल्मीकि का हृदय-परिवर्तन हो गया एवं वे रामभक्त बन रामायण के रचयिता बन गये। अर्थ का विचार आते ही स्वयं से प्रश्न करें कि क्या यह मुझे परमात्मा की ओर ले जा रहा है। मोक्षाभिलाशी के लिये संसारी वस्तुओं का कोई ‘अर्थ’ नहीं होता।
काम क्या है (What Is Kaam)
हर उस कामना को त्याग दें जो ईश्वर तक शीघ्र न ले जाये। पुण्य अवश्य करें किन्तु उनमें भी मूलभाव निष्काम हो। कुकाम का तो विचार भी नहीं करना है, सुकाम भी भक्ति की ओर ले जा रहा हो, हमें व सबको मुक्ति की ओर ले जा रहा हो।
भोजन-पान शरीर की आवश्यकताएँ हैं इसलिये भूख-प्यास को नैसर्गिक इच्छा व प्राकृतिक आवश्यकताएँ कह सकते हैं क्योंकि इनके बिना जीवन असम्भव-सा हो जायेगा परन्तु कामेच्छा वास्तव में न तो नैसर्गिक है, न ही कोई आवश्यकता क्योंकि यह इच्छा ‘होती’ नहीं ‘की जाती है, यदि व्यक्ति काम-विचार न करे तो इच्छा का तो अस्तित्व ही नहीं रह सकता।
जो काम सीधे ईश्वर के प्रति न हो उसे 6 शत्रुओं में गिना गया है जो प्राणी को मोक्ष से दूर ले जाते हैं – काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह एवं मात्यर्स। नयीचेतना का ‘विवाह करें या न करें’ आलेख पढ़ा जा सकता है। विभिन्न शास्त्रों में भी ब्रह्मचर्य की सार्थकता व काम की निरर्थकता पर ख़ूब ज़ोर दिया गया है।
अपनी हर कामना ईश्वर की ओर ले चलें तभी काम को पुरुषार्थ कहा जा सकता है। आपकी कामनाएँ आपकी मौलिक व तर्कसंगत आवश्यकताएँ नैतिक रूप से पूर्ण करने तक सीमित हों तो फिर भी ठीक है परन्तु ध्यान रहे कि इच्छाओं के आकाश में संतोष रूपी मेघ नहीं हुआ करते। अपनी इच्छा को आवश्यकता का नाम न दें।
निष्काम सद्कर्म की ही महिमा महान है, निष्काम कर्म – नेकी कर दरिया में डाल, गुप्तदान महादान, अर्थात् पुण्यकर्मों में भी निष्काम रहें तो अच्छा। कामना हो तो प्रभुमिलन की, इच्छा करनी ही हो परहित की किन्तु उसमें कहीं स्वार्थ की मिलावट न हो।
सर्प को रस्सी समझ उस पर लटककर अपनी पत्नी रत्ना के कक्ष में घुस आये तुलसीदास को रत्ना ने कह दिया – ” मेरे आकर्षण में साँप को रस्सी समझ चढ़ आये हो, इससे थोड़ी लगन भी यदि राम के लिये होती तो वे कब के तुम्हें मिल गये होते “।
इस घटना से तुलसीदास के ज्ञान-चक्षु खुल गये एवं उन्होंने रामचरितमानस का निर्माण किया। कोई भी इच्छा होने पर स्वयं को परमात्मा के अंश (जो कि हम सब यथार्थ में हैं) के रूप में देखकर सोचें कि क्या मेरा ऐसा सोचना उचित है, क्या मेरे स्थान पर कोई दैवीय अवतार होता तो वह ऐसा करता। क्या ईश्वर मुझसे ऐसा कराना चाहेंगे। प्रभुप्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति के मन में कामेच्छा बिल्कुल नहीं, बस रामेच्छा रमती है।
मोक्ष क्या है (What Is Moksha)
धर्म का मर्म समझ लिया हो तो मोक्ष निकट हो आता है। मोक्ष अर्थात् जन्म-जन्मान्तरों से विभिन्न शरीरों में भटकती आत्मा अबकी बार परमात्मा में लीन हो जाये, उसे प्रभु मिल जायें। पुनः नया शरीर धारण न करना पड़े, कष्टों व यातनाओं की शृंखला टूटकर समाप्त हो जाये। अथाह व स्थायी परमानन्द का अनन्त झरना मिल जाये जो प्रभु के चरणों में ही है।
परिजन, धन इत्यादि हर नश्वरता की मोह माया से सर्वथा परे उठकर शाश्वत् प्रभु के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पित हो जाने से ही प्रभु मिल सकते हैं। कागज़ की कश्ती जैसे संसार रूपी नौका को तन व मन से पूर्णतया त्यागना होगा एवं अध्यात्म रूपी अनश्वर नौका का आश्रय ग्रहण करना होगा तभी दुःखों, पीड़ाओं, कष्टों की बाढ़ से बने भँवर इस कुटिल भवसागर से पार पाया जा सकता है।
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