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25 संस्कृत श्लोक जो ज़िन्दगी का असली महत्व बताते है !

December 14, 2016 By Surendra Mahara 35 Comments

25 संस्कृत श्लोक जो ज़िन्दगी का असली महत्व बताते है ! Sanskrit Slokas With Meaning in Hindi

Table of Contents

संस्कृत श्लोक हिन्दी – अर्थ सहित Sanskrit Shlok Hindi Arth Sahit

सीखने की चाह हो तो व्यक्ति कही से भी कुछ भी अच्छी बातें सीख सकता है. मैंने भी अपने स्कूल के दिनों में संस्कृत विषय का अध्ययन किया था उसमे मुझे संस्कृत की कहानियों के अलावा संस्कृत श्लोक काफी अच्छे लगते थे. ये श्लोक समझने में जितने आसान होते थे उतना ही ज्यादा इनसे ज्ञान की बातें सीखने को मिलती थी.

यही मेरे जीवन का वह समय था जहाँ से मेरे अंदर नैतिक शिक्षा बढ़ी और सीखने की ललक जागी. आज इस पोस्ट में यहाँ मैं आपके साथ बेहतरीन संस्कृत श्लोक शेयर कर रहा हूँ जिनका हिन्दी अर्थ भी साथ में दिया हुआ है. मेरी आपसे रिक्वेस्ट है की इन श्लोक को आप अच्छी तरह से पढ़े और अपनी लाइफ में इन्हें प्रैक्टिकल करना शुरू करे.

यकीन मानिए यह संस्कृत श्लोक मेरी तरह आपकी भी सोच में बदलाव लाएगी और आपकी आध्यातिम्क ऊर्जा को बढ़ाने में मदद करेगी.

Sanskrit Slokas With Meaning in Hindi

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संस्कृत श्लोक 1: स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा !
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् !!

हिन्दी अर्थ : किसी व्यक्ति को आप चाहे कितनी ही सलाह दे दो किन्तु उसका मूल स्वभाव नहीं बदलता ठीक उसी तरह जैसे ठन्डे पानी को उबालने पर तो वह गर्म हो जाता है लेकिन बाद में वह पुनः ठंडा हो जाता है.

संस्कृत श्लोक 2: अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते !
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः !!

हिन्दी अर्थ : किसी जगह पर बिना बुलाये चले जाना, बिना पूछे बहुत अधिक बोलते रहना, जिस चीज या व्यक्ति पर विश्वास नहीं करना चाहिए उस पर विश्वास करना मुर्ख लोगो के लक्षण होते है.

संस्कृत श्लोक 3: यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः !
चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता !!

हिन्दी अर्थ : अच्छे लोग वही बात बोलते है जो उनके मन में होती है. अच्छे लोग जो बोलते है वही करते है. ऐसे पुरुषो के मन, वचन व कर्म में समानता होती है.

संस्कृत श्लोक 4: षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता !
निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता !!

हिन्दी अर्थ : किसी व्यक्ति के बर्बाद होने के 6 लक्षण होते है – नींद, गुस्सा, भय, तन्द्रा, आलस्य और काम को टालने की आदत.

संस्कृत श्लोक 5: द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् !
धनवन्तम् अदातारम् दरिद्रं च अतपस्विनम् !!

हिन्दी अर्थ : दो प्रकार के लोगो के गले में पत्थर बांधकर उन्हें समुद्र में फेंक देना चाहिए. पहले वे व्यक्ति जो अमीर होते है पर दान नहीं करते और दूसरे वे जो गरीब होते है लेकिन कठिन परिश्रम नहीं करते.

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पढ़े : प्रेम पर संस्कृत श्लोक अर्थ सहित

संस्कृत श्लोक 6: यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् !
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि !!

हिन्दी अर्थ : वह व्यक्ति जो अलग – अलग जगहों या देशो में घूमता है और विद्वानों की सेवा करता है उसकी बुद्धि उसी तरह से बढती है जैसे तेल का बूंद पानी में गिरने के बाद फ़ैल जाता है.

संस्कृत श्लोक 7: परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः !
अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम् !!

हिन्दी अर्थ : अगर कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी सहायता करे तो उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दे वही अगर आपका परिवार का व्यक्ति आपको नुकसान पहुंचाए तो उसे महत्व देना बंद कर दे. ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में चोट लगने पर हमें तकलीफ पहुँचती है वही जंगल की औषधि हमारे लिए फायदेमंद होती है.

संस्कृत श्लोक 8: येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः !
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति !!

हिन्दी अर्थ : जिन लोगो के पास विद्या, तप, दान, शील, गुण और धर्म नहीं होता. ऐसे लोग इस धरती के लिए भार है और मनुष्य के रूप में जानवर बनकर घूमते है.

संस्कृत श्लोक 9: अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः !
उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम् !!

हिन्दी अर्थ : निम्न कोटि के लोगो को सिर्फ धन की इच्छा रहती है, ऐसे लोगो को सम्मान से मतलब नहीं होता. एक मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और सम्मान दोनों की इच्छा करता है वही एक उच्च कोटि के व्यक्ति के सम्मान ही मायने रखता है. सम्मान धन से अधिक मूल्यवान है.

संस्कृत श्लोक 10: कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति !
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् !!

हिन्दी अर्थ : जिस तरह नदी पार करने के बाद लोग नाव को भूल जाते है ठीक उसी तरह से लोग अपने काम पूरा होने तक दूसरो की प्रसंशा करते है और काम पूरा हो जाने के बाद दूसरे व्यक्ति को भूल जाते है.

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संस्कृत श्लोक

संस्कृत श्लोक 11: न चोरहार्य न राजहार्य न भ्रतृभाज्यं न च भारकारि !
व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् !!

हिन्दी अर्थ : इसे न ही कोई चोर चुरा सकता है, न ही राजा छीन सकता है, न ही इसको संभालना मुश्किल है और न ही इसका भाइयो में बंटवारा होता है. यह खर्च करने से बढ़ने वाला धन हमारी विद्या है जो सभी धनो से श्रेष्ठ है.

संस्कृत श्लोक 12: शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः !
वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा !!

हिन्दी अर्थ : सौ लोगो में एक शूरवीर होता है, हजार लोगो में एक विद्वान होता है, दस हजार लोगो में एक अच्छा वक्ता होता है वही लाखो में बस एक ही दानी होता है.

संस्कृत श्लोक 13: विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन !
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते !!

हिन्दी अर्थ : एक राजा और विद्वान में कभी कोई तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि एक राजा तो केवल अपने राज्य में सम्मान पाता है वही एक विद्वान हर जगह सम्मान पाता है.

संस्कृत श्लोक 14: आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः !
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति !!

हिन्दी अर्थ : मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है. मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र परिश्रम होता है क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं रहता.

संस्कृत श्लोक 15: यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् !
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति !!

हिन्दी अर्थ : जिस तरह बिना एक पहिये के रथ नहीं चल सकता ठीक उसी तरह से बिना पुरुषार्थ किये किसी का भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता.

पढ़े : परिश्रम पर संस्कृत श्लोक अर्थ सहित

संस्कृत श्लोक 16: बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः !
श्रुतवानपि मूर्खो सौ यो धर्मविमुखो जनः !!

हिन्दी अर्थ : जो व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता है वह व्यक्ति बलवान होने पर भी असमर्थ, धनवान होने पर भी निर्धन व ज्ञानी होने पर भी मुर्ख होता है.

संस्कृत श्लोक 17: जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं !
मानोन्नतिं दिशति पापमपा करोति !!

हिन्दी अर्थ : अच्छे दोस्तों का साथ बुद्धि की जटिलता को हर लेता है, हमारी बोली सच बोलने लगती है, इससे मान और उन्नति बढती है और पाप मिट जाते है.

संस्कृत श्लोक 18: चन्दनं शीतलं लोके,चन्दनादपि चन्द्रमाः !
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः !!

हिन्दी अर्थ : इस दुनिया में चन्दन को सबसे अधिक शीतल माना जाता है पर चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल होती है लेकिन एक अच्छे दोस्त चन्द्रमा और चन्दन से शीतल होते है.

संस्कृत श्लोक 19: अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् !
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् !!

हिन्दी अर्थ : यह मेरा है और यह तेरा है, ऐसी सोच छोटे विचारो वाले लोगो की होती है. इसके विपरीत उदार रहने वाले व्यक्ति के लिए यह पूरी धरती एक परिवार की तरह होता है.

संस्कृत श्लोक 20: पुस्तकस्था तु या विद्या, परहस्तगतं च धनम् !
कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम् !!

हिन्दी अर्थ : किताब में रखी विद्या व दूसरे के हाथो में गया हुआ धन कभी भी जरुरत के समय काम नहीं आते.

पढ़े : सुकरात के अनमोल वचन

संस्कृत श्लोक 21: विद्या मित्रं प्रवासेषु, भार्या मित्रं गृहेषु च !
व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च !!

हिन्दी अर्थ : विद्या की यात्रा, पत्नी का घर, रोगी का औषधि व मृतक का धर्म सबसे बड़ा मित्र होता है.

संस्कृत श्लोक 22: सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् !
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः !!

हिन्दी अर्थ : बिना सोचे – समझे आवेश में कोई काम नहीं करना चाहिए क्योंकि विवेक में न रहना सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. वही जो व्यक्ति सोच – समझ कर कार्य करता है माँ लक्ष्मी उसी का चुनाव खुद करती है.

संस्कृत श्लोक 23: उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः !
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः !!

हिन्दी अर्थ : दुनिया में कोई भी काम सिर्फ सोचने से पूरा नहीं होता बल्कि कठिन परिश्रम से पूरा होता है. कभी भी सोते हुए शेर के मुँह में हिरण खुद नहीं आता.

संस्कृत श्लोक 24: विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् !
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् !!

हिन्दी अर्थ : विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है, विनम्रता से योग्यता आती है व योग्यता से हमें धन प्राप्त होता है और इस धन से हम धर्म के कार्य करते है और सुखी रहते है.

संस्कृत श्लोक 25: माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः !
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा !!

हिन्दी अर्थ : जो माता – पिता अपने बच्चो को पढ़ाते नहीं है ऐसे माँ – बाप बच्चो के शत्रु के समान है. विद्वानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता वह वहां हंसो के बीच एक बगुले की तरह होता है.

संस्कृत श्लोक 26: सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् !
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् !!

हिन्दी अर्थ : सुख चाहने वाले को विद्या नहीं मिल सकती है वही विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता. इसलिए सुख चाहने वालो को विद्या का और विद्या चाहने वालो को सुख का त्याग कर देना चाहिए.


📚 20 संस्कृत श्लोक अर्थ सहित (Sanskrit Shlokas with Meaning in Hindi)

  1. असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥
    👉 असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
  2. सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

    👉 सभी सुखी रहें, सभी निरोगी रहें, सभी शुभ देखें और कोई भी दुःखी न हो।
  3. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

    👉 तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। इसलिए कर्म करते रहो।
  4. गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
    गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

    👉 गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। वे परम ब्रह्म हैं — उन्हें नमस्कार।
  5. विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
    पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

    👉 विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से धर्म व सुख।
  6. मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथि देवो भव॥
    👉 माता, पिता, गुरु और अतिथि को देवता के समान मानो।
  7. अहिंसा परमो धर्मः।
    👉 अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है।
  8. धर्मो रक्षति रक्षितः।
    👉 जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
  9. नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
    👉 सदैव कर्म करो, क्योंकि कर्म अकर्म (कुछ न करने) से श्रेष्ठ है।
  10. उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
    👉 अपने आप को स्वयं उठाओ, गिरने मत दो।
  11. सा विद्या या विमुक्तये।
    👉 वही सच्ची विद्या है जो मुक्ति दिलाए।
  12. न चोरहार्यं न च राजहार्यं
    न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
    व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
    विद्या धनं सर्वधनप्रधानम्॥

    👉 विद्या ऐसा धन है जो न चोरी हो सकता है, न राज्य छीन सकता है — ये हमेशा बढ़ता है।
  13. गुणैः विना न शोभन्ते निर्गुणाः पुरुषाः।
    👉 बिना गुणों के मनुष्य शोभा नहीं पाते।
  14. नास्ति विद्यासमं चक्षुः।
    👉 विद्या से बड़ा कोई नेत्र (दृष्टि) नहीं।
  15. विद्या विवादाय धनं मदाय।
    शक्तिः परेषां परिपीडनाय॥

    👉 बुरी प्रवृत्तियों वाले लोग विद्या को विवाद के लिए और शक्ति को दूसरों को पीड़ित करने में लगाते हैं।
  16. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
    👉 माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।
  17. परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः।
    👉 वृक्ष दूसरों के लिए फलते हैं, परोपकार करते हैं।
  18. एकोऽहं बहुस्याम।
    👉 मैं एक हूं, अनेक बनूं।
  19. शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
    👉 शरीर धर्म साधना का पहला साधन है — इसकी रक्षा आवश्यक है।
  20. सर्वं खल्विदं ब्रह्म।
    👉 यह सम्पूर्ण जगत ही ब्रह्म (परमात्मा) है।

📖 “संस्कृत सिर्फ भाषा नहीं, यह हमारी संस्कृति की आत्मा है।”

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Comments

  1. Anjali says

    September 14, 2017 at 3:12 pm

    Not good

  2. Anjali says

    September 14, 2017 at 3:12 pm

    Good shloks

  3. vivek says

    April 27, 2017 at 9:27 pm

    अति महत्वपूर्ण श्लोक है जिनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला कोटि कोटि धन्यवाद

  4. नई विचारधारा says

    December 26, 2016 at 6:34 pm

    बहुत ही ज्ञानवर्धक श्लोकों का संग्रह है ……..बहुत खूब ………

  5. Surendra Mahara says

    December 26, 2016 at 3:10 pm

    धन्यवाद जय जी. आपको हमारे श्लोक पसंद आये.

  6. जय अग्रवाल says

    December 26, 2016 at 3:06 pm

    मुझे आपके द्वारे दिए गए संस्कृत श्लोक पसंद आये. मैं इनमे से कुछ बच्चों की संस्कार कक्षा में वर्णित करूंगा.

  7. Surendra Mahara says

    December 16, 2016 at 8:34 am

    धन्यवाद निखिल जी. आपने बहुत सही कहा है. जब विद्या होगी तभी सुख आएगा.

  8. Nikhil Jain says

    December 15, 2016 at 1:06 pm

    जिंदगी पर आधारित संस्कृत श्लोकों का बहुत ही बढ़िया तरीके से आपने वर्णन किया। सभी श्लोक जीवन की सच्चाई को दर्शाते है। अगर विद्या प्राप्त करनी है तो सुख को छोड़ना पढ़ेगा लेकिन जब विद्या प्राप्त हो जायेगी और अभिमान दूर रहेगा तब अपने आप सुख हमारे पास आएगा।
    धन्यवाद आपका।

  9. Surendra Mahara says

    December 15, 2016 at 9:10 am

    Thankyou so much prnav ji.

  10. प्रणव भारद्वाज says

    December 14, 2016 at 4:33 pm

    बहुत सुन्दर : संस्कृत भाषा से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं !

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